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सारकॉइडोसिस हालांकि व्यापक रूप से यह माना जाता है कि TNF-अल्फा कणिकागुल्मों की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, पर यह देखा गया कि सारकॉइडोसिस, TNF-अल्फा प्रतिरोधी इटेनरसेप्ट द्वारा उपचार किए जाने पर प्रेरित होता है।
अचलताकारक कशेरूकाशोथ ए.एस. एक सार्वदैहिक आमवाती रोग है यानी यह सारे शरीर को प्रभावित करता है और सीरमऋणात्मक कशेरूकासंधिविकारों में एक है। लगभग 90% रोगी HLA-B27 जीनप्ररूप को परिलक्षित करते हैं। ट्यूमर नेक्रोसिस फैक्टर-अल्फा (TNF α) और IL-1 भी अचलताकारक कशेरूकाशोथ के कारणों में गिने जाते हैं। ए.एस. के विशिष्ट स्वप्रतिपिंडों की पहचान अभी नहीं हो पाई है। न्यूट्रोफिल-प्रतिरोधी जीवद्रव्यीय प्रतिपिंडों (ANCA) का संबंध अ. क. से पाया गया है, पर रोग की तीव्रता से वे परस्पर संबंधित प्रतीत नहीं हो पाए हैं।
अचलताकारक कशेरूकाशोथ TNFα अवरोधकों को सबसे आशाजनक उपचार के रूप में दर्शाया गया है जिसने अधिकांश मामलों में ए.एस. की बढ़त धीमी की है और अनेक रोगियों के शोथ व दर्द में पूरी नहीं तो उल्लेखनीय कमी लाई है। उन्हें न केवल जोड़ों के संधिशोथ बल्कि ए.एस. से उत्पन्न मेरूदणड के संधिशोथ का इलाज करने में भी प्रभावकारी पाया गया है। महंगा होने के अलावा इन दवाओं की एक खामी यह है कि इनसे संक्रमण होने का जोखम बढ़ जाता है। इस वजह से किसी भी TNF-α अवरोधक से उपचार शुरू करने के पहले क्षयरोग के लिये परीक्षा (मैंटाक्स या हीफ) करने का नियम है। बारंबार संक्रमण होने की स्थिति में या गला खराब होने पर भी उपचार को रोक दिया जाता है क्यौंकि स्वक्षम शक्ति कम हो जाती है। TNF दवाईयां ले रहे रोगियों को हिदायत दी जाती है कि वे ऐसे लोगों से दूर रहें जो किसी वाइरस (जैसे जुकाम या इनफ्लुएंज़ा) के वाहक हों या जीवाणु या फफूंदी संक्रमण से ग्रस्त हों.
प्रदाहक आन्त्र रोग प्रदाहक आन्त्र रोग का इष्टतम उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि इसका रूप क्या है। उदाहरण के लिए, मेसालजीन क्रोहन रोग की तुलना में व्रणमय बृहदांत्रशोथ में अधिक उपयोगी है। आम तौर पर, गंभीरता के स्तर के आधार पर, आईबीडी (IBD) में लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए प्रतिरक्षादमन की आवश्यकता हो सकती है, जैसे प्रेडनीसोन, टीएनएफ (TNF) निरोध, एजाथायोप्रीन (इम्यूरान), मीथोट्रेक्सेट या 6-मर्केप्टोप्यूरीन. अधिक सामान्यतः, आईबीडी (IBD) के उपचार में मेसालजीन के रूप की आवश्यकता होती है। अक्सर रोग के फैलने पर नियंत्रण के लिए स्टेरॉयड का इस्तेमाल किया जाता है, जो एक समय रखरखाव दवा के रूप में स्वीकार्य थे। अनेक वर्षों से क्रोहन रोग के मरीजों में प्रयुक्त जैविकों, जैसे टीएनएफ (TNF) निरोधकों का उपयोग हाल में वृणमय बृहदांत्रशोथ के मरीजों हुआ है। गंभीर मामलों में शल्यक्रिया की आवश्यकता हो सकती है, जैसे आंत्र उच्छेदन, आकुंचन संधान या एक अस्थाई या स्थाई बृहदान्त्रछिद्रीकरण या शेषान्त्रछिद्रीकरण. आंत्र रोगों के लिए वैकल्पिक चिकित्सा में कई रूपों में उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन इस तरह की पद्धतियों में अंतर्निहित विकृतियों के नियंत्रण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है ताकि लंबे समय स्टेरॉयड से संपर्क न रहे या शल्यक्रियात्मक चिकित्सा न करानी पड़े.
सारकॉइडोसिस कणिकागुल्मीय सूजन मुख्यतः एककेंद्रक श्वेतकोशिकाओं, बड़ी भक्षक-कोशिकाएँ और सक्रिय T-लिम्फ़ोसाइट के संचय, तथा Th1-ध्रुवीय प्रतिक्रिया (T-सहायक लिम्फ़ोसाइट-1 प्रतिक्रिया) की विशेषता मुख्य प्रदाहक मध्यस्थ, TNF-अल्फ़ा, INF-गामा, IL-2 और IL-12 के वर्धित निर्माण से संलक्षित होता है। सारकॉइडोसिस का प्रदाहक प्रक्रियाओं पर विरोधाभासी असर पड़ता है; यह वर्धित बृहतभक्षककोशिका और CD4 सहायक T-कोशिका सक्रियता से प्रदर्शित होता है जो त्वरित सूजन में परिणत होता है, तथापि, ट्यूबरकुलीन जैसी प्रतिजन चुनौतियों के प्रति प्रतिक्रिया दब जाती हैं। एक साथ अति- और अल्प- गतिविधि की विरोधी हालत निष्क्रियता की दशा सुझाती है। संक्रमण और कैंसर के वर्धित खतरे के लिए निष्क्रियता भी जिम्मेदार हो सकती है। ऐसा लगता है कि सारकॉइड कणिकागुल्म की परिधि में नियामक T-लिम्फ़ोसाइट IL-2 स्राव को देते हैं जिसके बारे में अनुमान है कि प्रतिजन-विशिष्ट स्मृति प्रतिक्रियाओं को रोकते हुए निष्क्रिय दशा पैदा करते हैं।